जैन समाज के उज्ज्वल भविष्य के लिए – सेवा, शिक्षा और स्वावलंबन की आवश्यकता

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Dated: April 2025

जैन समाज अपनी उदारता, धार्मिक आस्था और सेवा-भाव के लिए प्रसिद्ध रहा है। धर्मानुष्ठानों में, तीर्थ निर्माण में और गुरु भगवंतों के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने में समाज कोई कसर नहीं छोड़ता। लेकिन आज आवश्यकता है कि यह दान-धर्म की गंगा अपने घर से बहनी शुरू हो—यानी पहले स्वधर्मी को सशक्त और स्वावलंबी बनाया जाए।

हमारा समाज धार्मिक आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करता है, यह सराहनीय है। पर क्या हमने यह सोचा है कि यदि समाज का ही अस्तित्व संकट में हो तो इन आयोजनों का क्या भविष्य रहेगा? जैन समाज के उत्थान के लिए अब केवल तीर्थ नहीं, शिक्षा के तीर्थ—जैन स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की भी उतनी ही आवश्यकता है।


शिक्षा के बिना समाज की प्रगति संभव नहीं

जैन समाज का प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो, ऐसा संकल्प आज के युग की माँग है। केवल व्यापार या धर्म में नहीं, बल्कि प्रशासन, राजनीति, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में भी जैनों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। कोई भूखा न रहे, कोई अशिक्षित न रहे—यही सच्चा समाज-सेवा का उद्देश्य होना चाहिए।

हमारे सामने उदाहरण हैं—ईसाई समाज का। उन्होंने जहाँ भी गये, वहाँ सबसे पहले अपने पूजा स्थल (चर्च) बनवाए। पर वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपने धर्म की पाँचवीं पीढ़ी तक को शिक्षित और सशक्त बनाने की योजना बनाई। चर्च के साथ स्कूल, स्कूल के साथ कॉलेज, और कॉलेज के साथ अस्पताल खड़े किए। यह धर्म और समाज की दीर्घकालिक रणनीति थी, जिसका परिणाम है कि आज क्रिश्चियनिटी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म बन चुका है।


हमें क्या करना चाहिए?

अब समय आ गया है कि हम केवल तीर्थ निर्माण तक सीमित न रहें। हमें भी शिक्षा, सेवा और साधना के त्रिसूत्रीय मार्ग पर चलना होगा।

  • हर जिले, हर गाँव में जैन स्कूल और कॉलेज स्थापित हों।
  • स्वधर्मी की जरूरतों को प्राथमिकता देकर उसे समर्थ और आत्मनिर्भर बनाया जाए।
  • गुरु भगवन्त और समर्थ जैन बंधु समाज में शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा के कार्यों में मार्गदर्शक बनें।
  • नई पीढ़ी को धर्म के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा से भी जोड़ें।

अब भी समय है – जागें तभी सवेरा

जैन धर्म लाखों वर्षों पुराना है, परन्तु वर्तमान में यह धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी धर्म और संस्कृति से जुड़ी रहें, तो हमें आज ही यह संकल्प लेना होगा कि हम सच्चे स्वधर्मी वत्सल बनें—स्वधर्मी की सहायता करें, उसे समर्थ बनाएं।

सामूहिक चेतना, सशक्त संकल्प और संगठित प्रयासों से ही हम जैन समाज को फिर से उज्ज्वल, प्रभावशाली और वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बना सकते हैं।

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