
ज्ञान के सागर, धर्म के नायक, युग के आप विधाता हैं,
सूरी सम्राट, खरतरगच्छ के, आप भाग्य-विधाता हैं।
जिनके मुख से झरती वाणी, अमृत की पावन धारा है,
जिनके तेज से आलोकित, यह जग सारा का सारा है।
श्रद्धा के दीप जल उठे हैं, भावों का श्रृंगार है,
दादावाड़ी के आंगन को गुरुवर का इंतजार है।
कुशल कांकरिया के संकल्प से, तैयारी जोर-शोर पर है,
युगप्रधान की झलक पाने को, श्रद्धा का सागर तट पर है।
मन में उमंग, हृदय में हर्ष, छाई खुशियों की बहार,
दादावाड़ी का कण-कण करता गुरुवर का इंतजार।
सज रहे हैं भावों के दीपक, महक रही श्रद्धा की डोर,
राष्ट्र संत के स्वागत को आतुर है हर जन-मन का छोर।
गली-गली में चर्चा गूँजे, घर-घर मंगल गान,
आ रहे हैं जिनमणिप्रभ गुरु, बढ़ेगा धर्म का मान।
श्रद्धा के पुष्प खिले हृदय में, उमड़े प्रेम के भाव,
गुरुवर के स्वागत को तत्पर है सारा संघ-समुदाय।
पलक-पाँवड़े बिछे हुए हैं, भक्तों का अनुराग अपार,
दादावाड़ी का कण-कण करता गुरुवर का इंतजार।

रचियता: ओम प्रकाश हुंडिया
प्रचार प्रसार समिति, श्री संघ शास्ता वर्षावास 2026,
त्रय नगर, हैदराबाद




