संयम के 53 स्वर्णिम वर्ष : आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा

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परम पूज्य 82वें गच्छाधिपति, त्याग, तप एवं तेजस्विता के प्रतीक आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. के पावन 53वें संयम दिवस (07 जुलाई 2026) एवं श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026, त्रय नगर, हैदराबाद में 26 जुलाई 2026 से प्रारम्भ होने वाले कारवान स्थित जिनकुशल दादावाड़ी प्रांगण में मंगलमय चातुर्मास प्रवेश के पावन अवसर पर यह लेख श्रद्धा, कृतज्ञता और विनम्र भावांजलि स्वरूप समर्पित है। आचार्य श्री का संयममय जीवन, तपश्चर्या, शास्त्रनिष्ठा, संगठन शक्ति तथा जिनशासन प्रभावना का अप्रतिम योगदान समस्त जैन समाज के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की इस संक्षिप्त झलक के माध्यम से उनके प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करने का समस्त त्रय नगर हैदराबाद के श्रद्धालुओं की तरफ से ओम प्रकाश हुंडिया  का यह एक विनम्र प्रयास है।

“संयम की आभा, खरतर का गौरव : आचार्य प्रवर का महायात्रा वृत्तांत”
“शून्य से शिखर तक की, यह अनोखी गाथा है,
त्याग की प्रतिमूर्ति, वो साक्षात् विधाता है।
मोकलसर की माटी से उपजा, वो पावन नूर है,
खरतर के गगन का, वो चमकता हुआ ‘मणिप्रभ’ सूर है।”

      मरुधरा की पावन धरा मोकलसर में जन्मा एक बालक आगे चलकर खरतरगच्छ की गौरवशाली परंपरा का ऐसा प्रकाशपुंज बनेगा, यह शायद उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। विक्रम संवत् 2016 फाल्गुन सुदि 14 (12 मार्च 1960) को पारसमलजी लुंकड़ एवं धर्मनिष्ठा की प्रतिमूर्ति माता रोहिणी देवी के आँगन में जन्मे बालक मीठालाल ने बचपन से ही संस्कार, संवेदना और अध्यात्म का अमृत पाया। पिता का साया अल्पवय में उठ गया, परन्तु माता ने मातृत्व के साथ अनुशासन और धर्मभाव का ऐसा सिंचन किया कि वही बालक आगे चलकर संयम और साधना का विराट प्रतीक बन गया।

       खरतरगच्छ की सुविहित परंपरा, जो आचार्य जिनेश्वरसूरि, आचार्य अभयदेवसूरि तथा दादागुरुदेव जैसे महान प्रभावकों से आलोकित रही है, उसी गौरवशाली परंपरा में विरले ही ऐसे मनीषी जन्म लेते हैं जिनका जीवन केवल आत्मकल्याण तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। 82वें गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी महाराज साहब का व्यक्तित्व इसी चैतन्य परंपरा का तेजस्वी स्वरूप है। त्याग, तप, संगठन और शास्त्रनिष्ठा के साथ उनकी सहजता, सरलता और समभाव प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्पर्श करते हैं। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, विद्वान अथवा सामान्य, सभी के प्रति उनका व्यवहार समान, स्नेहपूर्ण और विनम्र रहता है। किसी भी जिज्ञासु की शंका का वे अत्यंत सरल एवं शास्त्रसम्मत समाधान प्रस्तुत करते हैं।

     मात्र 13 वर्ष की कोमल आयु में सिद्धाचल गिरिराज की पुण्यभूमि पर वि.सं. 2030 आषाढ़ वदि 7 (23 जून 1973) को आपने अपनी पूज्य माता एवं बहन के साथ संयम जीवन को अंगीकार किया। यह केवल दीक्षा नहीं थी, बल्कि आत्मकल्याण और लोककल्याण के मार्ग पर चलने का दिव्य संकल्प था। प्रज्ञापुरुष आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरिजी के सान्निध्य में आपने संस्कृत, प्राकृत, न्याय एवं ज्योतिष जैसे गूढ़ विषयों का गंभीर अध्ययन कर अद्भुत विद्वत्ता अर्जित की। संयम जीवन के प्रत्येक चरण पर आपका व्यक्तित्व और अधिक तेजस्वी होता गया। पादरू में गणि पद, गढ़ सिवाना में उपाध्याय पद, सिंधनूर में गच्छाधिपति पद तथा अंततः सिद्धाचल की पावन भूमि पर आचार्य पद से विभूषित होकर आपने खरतरगच्छ को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। 12 मार्च 2016 को पालीताना में देशभर से पधारे अनेक गच्छाधिपतियों, आचार्य भगवंतों तथा हजारों श्रावक-श्राविकाओं की भव्य उपस्थिति में आपको आचार्य पद की पदवी प्रदान की गई। यह केवल पद-प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण खरतरगच्छ के स्वर्णिम भविष्य की घोषणा थी।

     आचार्य श्री का व्यक्तित्व केवल साधना तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने धर्म को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संगठन, स्थापत्य और संस्कार—तीनों क्षेत्रों में ऐतिहासिक कार्य किए। माण्डवला में विश्व का प्रथम जहाज मंदिर, केसरियाजी में अठारह हाथियों पर निर्मित गज मंदिर, बाड़मेर की कुशल वाटिका में राजहंस मंदिर तथा शहादा का सुघोषा घंट मंदिर उनकी दूरदर्शिता, आध्यात्मिक दृष्टि और विलक्षण कल्पनाशक्ति के साक्षी हैं। उज्जैन स्थित प्राचीन अवंति पार्श्वनाथ तीर्थ का जीर्णोद्धार करवाकर उन्होंने सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में भी अमूल्य योगदान दिया।

      उन्होंने केवल मंदिरों का निर्माण ही नहीं कराया, बल्कि समाज निर्माण का भी विराट अभियान चलाया। देशभर में खरतरगच्छ युवा परिषद एवं खरतरगच्छ महिला परिषद की स्थापना कर उन्होंने युवाशक्ति और मातृशक्ति को जिनशासन की प्रभावना से जोड़ा। साथ ही ‘ज्ञान वाटिका’ जैसी संस्कारमयी पहल के माध्यम से हजारों नन्हें बालक-बालिकाओं के जीवन में धर्म, आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यों के बीज बोए, जो आज भी देशभर में निरंतर फल-फूल रही है।

       53 वर्षों के संयम जीवन में उनकी धर्मप्रभावना का विस्तार अद्भुत रहा है। देशभर में दस हजार से अधिक जिनप्रतिमाओं की अंजनशलाका एवं प्रतिष्ठाएँ सम्पन्न कराकर उन्होंने अनगिनत जिनालयों को आध्यात्मिक चेतना से आलोकित किया। 24 बार छः री पालित संघ सम्पन्न कराकर सैकड़ों श्रद्धालुओं को उत्कृष्ट आराधना का अवसर प्रदान किया तथा 17 बार उपधान तप की आराधना करा कर के हजारों साधकों के जीवन को निर्मल एवं संयममय बनाया। इसके अतिरिक्त 167 दीक्षाओं के माध्यम से अनेक आत्माओं को संयम मार्ग पर अग्रसर किया। ये केवल आँकड़े नहीं, बल्कि धर्मप्रभावना के स्वर्णिम अध्याय हैं।

“सिर्फ लकीरें नहीं, उन्होंने तकदीर बदली है,
खरतर के गौरव की, हर एक तस्वीर बदली है।
हैं नमन उस संत को, जिनकी करुणा की छांव में,
हजारों रूहों ने प्रभु-भक्ति की जागीर बदली है।”

      आचार्य श्री का सम्पूर्ण जीवन पदयात्रा, पुरुषार्थ और जनजागरण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने देशभर में एक लाख बीस हजार किलोमीटर से अधिक का पैदल विहार कर गाँव-गाँव, नगर-नगर और जन-जन तक जिनवाणी का प्रकाश पहुँचाया। उनकी पदयात्राएँ केवल विहार नहीं, बल्कि संस्कार, सद्भाव और धर्मजागरण की चलती-फिरती पाठशालाएँ रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की स्थापना तथा उनके कुशल मार्गदर्शन द्वारा आपने सम्पूर्ण खरतरगच्छ समाज को एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक कार्य किया है। आपके बहुआयामी योगदान, विलक्षण तपश्चर्या और धर्मशासन की प्रभावना के सम्मानस्वरूप जैसलमेर में आयोजित भव्य चादर महोत्सव में आपको “राष्ट्र रत्न” एवं “सूरी सम्राट” जैसे अलंकरणों से विभूषित किया गया। यह सम्मान केवल एक महापुरुष का अभिनंदन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण खरतरगच्छ एवं सकल जैन समाज के गौरव का अभिनंदन है आज जब समाज दिशाहीनता, भौतिकता और विघटन के दौर से गुजर रहा है, तब आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. का जीवन संयम, संस्कार, संगठन और समभाव का उज्ज्वल संदेश देता है। उनका तपोबल, त्यागबल, करुणा, सरलता और दूरदर्शिता खरतरगच्छ की गौरवशाली परंपरा को निरंतर नई ऊँचाइयों तक ले जा रही है। निस्संदेह उनका जीवन वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अमिट प्रेरणापुंज है।

“आलोकित है खरतर शासन,
शास्त्रविहित सुविहित आराधन।”

“जहाँ संयम का दीप जलता है, वहीं प्रकाश होता है,
गुरु की निश्रा मिले तो, फिर हर पल खास होता है।
दुनियां की भीड़ से हटकर, जो खुद को निखार गए,
वही ‘जिनमणिप्रभ’ बनकर, सब पर राज करते हैं।”

लेखक: ओम प्रकाश हुंडिया
प्रचार प्रसार समिति, श्री संघ शास्ता वर्षावास त्रय नगर 2026 हैदराबाद

इस पावन अवसर पर श्रमण भारती पत्रिका परिवार परम पूज्य आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. के चरणों में श्रद्धापूर्वक वंदन करते हुए 53वें संयम दिवस एवं मंगलमय चातुर्मास प्रवेश की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता है। पूज्य आचार्य श्री का पावन सान्निध्य और प्रेरक मार्गदर्शन दीर्घकाल तक जिनशासन की प्रभावना एवं समाज के आध्यात्मिक उत्थान का पथ प्रशस्त करता रहे—यही मंगलकामना है।

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