
Authenticity vs Viral content
आज के डिजिटल युग में सूचनाएं प्रकाश की गति से फैल रही हैं। स्मार्टफोन्स ने हमें दुनिया से तो जोड़ दिया है, लेकिन ‘लाइक्स’ और ‘शेयर’ की अंधी दौड़ ने प्रामाणिकता (Authenticity) का एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वायरल (Viral) होती भ्रामक सामग्री के शोर में सत्य कहीं दब कर रह गया है।
एक सामाजिक-धार्मिक पत्रिका और जैन दर्शन के अनुयायी होने के नाते, यह हमारे लिए आत्म-मंथन का विषय है। बिना सोचे-समझे असत्य जानकारी को आगे बढ़ाना भी एक प्रकार की ‘भाव हिंसा’ है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि सत्य की कसौटी क्या हो?
वास्तव में, प्रामाणिकता का सच्चा और शाश्वत स्रोत आज भी हमारे प्राचीन ग्रंथ, आगम और शास्त्र ही हैं। जिस तरह शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दैनिक पोषण की आवश्यकता होती है, उसी तरह मन को वैचारिक प्रदूषण से बचाने के लिए हमें प्रतिदिन इन शास्त्रों से ज्ञान की एक ‘खुराक’ (Dose) अवश्य लेनी चाहिए। यह आज के इस भ्रमित करने वाले परिवेश में ‘स्वाध्याय’ के बढ़ते हुए महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
वायरल सामग्री की क्षणिक प्रसिद्धि कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकती। आइए, ‘अनेकांतवाद’ की दृष्टि अपनाएं और नियमित स्वाध्याय का संकल्प लें, ताकि हम सोशल मीडिया के मायाजाल में मूक उपभोक्ता न रहकर, सत्य के सच्चे रक्षक और अन्वेषक बन सकें।




