
गत वर्षों में जैन समाज कई मायनों में मजबूत हुआ है। एक तो हमारे साधुओं की संख्या काफी बढ़ी है। जाहिर है कि साधु बढ़े हैं तो धर्म का प्रचार प्रसार और गतिविधियाँ भी काफी बढ़ी हैं। दूसरे धार्मिकता के साथ-साथ सामाजिकता की बातें भी होने लगी हैं। बुद्धिजीवी जैन समाज अब किसी भी सही बात के लिये आगे बढ़कर काम करने को तैयार है।
जीर्णोद्धार मन्दिरों, धर्मस्थानों का निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहा है। धार्मिक कार्यों में धन का भरपूर उपयोग हो रहा है। तपस्याओं के कीर्तिमान बन रहे हैं। भविष्य और वर्तमान के लिए प्रेरक योजनाएँ बनाकर उस पर प्रगति हो रही है। धार्मिक साहित्य, शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सालय, गोशालाओं का संचालन हो रहा है।
संत शिरोमणी परमपूज्य आचार्यों की प्रेरणा से संचालन, आई.ए.एस. अकादमियों का संचालन तथा प्रतिभाशाली सहित अनेक कई अच्छे कार्य हो रहे हैं। कल्याणकारी योजनाओं का संचालन निश्चित रूप से एक सुखद परिवर्तन का संकेत है। परमपूज्य श्री नयपद्मसागरजी की प्रेरणा से स्थापित ‘जीतो’ द्वारा तो समाज के लिये हर क्षेत्र में काम किया जा रहा है। भारतीय जैन संघटना भी अनेक दिशाओं में सक्रिय हो रहा है। परमपूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज द्वारा बुद्धिजीवियों और युवाओं को समाज में जोड़ने का बड़ा भारी काम किया जा रहा है। साथ ही अन्य अनेक संस्थाएँ भी समाज को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। लगता है कि सब एक सुखद शुरुआत है।
लेकिन अनेक अच्छाइयों के साथ हमें अनेक प्रकार की चुनौतियों, परेशानियों, खतरों का भी सामना करना पड़ रहा है। धर्मस्थानों पर अवैध कब्जे, आक्रमण, असुरक्षा बढ़ती जा रही है। नाम के लिए प्राचीनता मिटाने के कृत्य भी हो रहे हैं। दिखावा, प्रदर्शन और प्राचीन तीर्थ स्थानों की चिन्ता छोड़कर नये तीर्थधाम बनाने की होड़ लगी है। उनका भविष्य क्या होगा जबकि पूजकों की संख्या घट रही है।
महोत्सवों, प्रतिष्ठा एवं अन्य धार्मिक आयोजनों में लगातार खर्च बढ़ता जा रहा है। दिखावा, प्रदर्शन संगीतकार, टैण्ट वाले, बैण्ड वाले, कैटर्स और ना जाने कहाँ कहाँ अनाप शनाप पैसा खर्च किया जा रहा है। श्रेष्ठी वर्ग द्वारा वैभव प्रदर्शन की होड़ बढ़ रही है तथा शादी विवाह में अपार धन का व्यय किया जा रहा है जिससे मध्यम वर्ग में रिश्तों की समस्या बढ़ रही है तथा जैनेतर विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है। रात्रि विवाह तो एक सामान्य बात हो गई हैं शादी विवाह में बार भी लगने लगे हैं।
प्रेम विवाह, ‘लव जेहाद’, धर्मान्तरण के कारण नई पीढ़ी पर ध्यान न दिए जाने से मुस्लिम, ईसाई एवं अजैनों में शादी हो रही हैं। धर्म छूट रहा है, समाज टूट रहा है। चौमासे में हमें समस्याओं के समाधान पर भी चिन्तन करके ठोस कदम उठाने चाहिए।




